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Cricket Essay In Hindi Wikipedia In Hindi

Mera Priya Khel (Favorite Sport) Cricket In Hindi दुनिया में सबसे ज्यादा प्रसिध्य और भारत का पसंदीदा गेम है क्रिकेट. क्रिकेट एक ऐसा है, जिसे बच्चे, बड़े, बूढ़े, यहाँ तक की औरतें, लड़कियां भी पसंद करती है. क्रिकेट एक आउटडोर गेम है. यह तो हम सबको पता है, कि मनुष्य को चुस्त तंदरुस्त रहने के लिए शारीरिक व्यायाम की आवश्कता होती है. शारीरिक कसरत के लिए, किसी खेल से बेहतर कुछ नहीं हो सकता है. इन खेलों में मनुष्य को शारीरिक कसरत के साथ साथ दिमाग का भी उपयोग करना होता है. जिससे मानसिक शारीरिक दोनों रूप से स्फूर्ति मिलती है. आजकल की आधुनिक दुनिया में बच्चे बड़े सभी मोबाइल, टीवी, कंप्यूटर में लगे रहते है, शारीरिक परिश्रम को कोई तवज्जो नहीं देता है. ऐसे में बड़ों का फर्ज है कि वे अपने बच्चों को खेल की उपयोगिता के बारे में बताएं. क्रिकेट का खेल अनुशासन, दृढ संकल्प, एकाग्रता, टीम भावना एवं संयम का खेल है.

मेरा प्रिय खेल क्रिकेट

My Favorite Sport Cricket In Hindi

भारत में समय के साथ कई खेल खेले जाते है, जिसमें से कुछ अन्तराष्ट्रीय एवं कुछ राष्ट्रीय स्तर पर खेले जाते है. क्रिकेट, वॉलीबॉल, फुटबॉल, होकी, बास्केटबाल, बैडमिंटन, टेनिस आदि अन्तराष्ट्रीय स्तर पर खेले जाते है, जबकि कबड्डी, रग्बी और अनेकों खेल भारत में राष्ट्रीय एवं क्षेत्रीय स्तर में खेले जाते है. क्रिकेट एक ऐसा खेल है, जिसने दुनिया भर के लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया है. कई ऐसे देश है, जहाँ ये खेल नहीं खेला जाता है, लेकिन वहां पर भी अन्तराष्ट्रीय स्तर के क्रिकेट मैच को बड़े हर्षोल्लास के साथ देखते है.

अन्तराष्ट्रीय क्रिकेट टीम के नाम (International Cricket team Names List) –

क्रमांकनाम
1.इंग्लैंड
2.ऑस्ट्रेलिया
3.वेस्ट इंडीज
4.साउथ अफ्रीका
5.न्यूजीलैंड
6.इंडिया
7.पाकिस्तान
8.बांग्लादेश
9.जिम्बाब्वे
10.श्रीलंका
11.केन्या
12.अफगानिस्तान
13.आयरलैंड
14.कैनेडा
15.नीदरलैंड
16.स्कॉटलैंड

क्रिकेट का इतिहास (Cricket History In India) –

क्रिकेट को कई ऐसे लोग है जो न सिर्फ पसंद करते है, बल्कि दीवानगी की हद तक प्यार करते है. क्रिकेट मैच की शुरुवात 16वीं शताब्दी में इंग्लैंड में हुई थी. इसे सबसे पहले प्रिन्स एडवर्ड द्वारा खेला गया था. 18वीं शताब्दी में यह इंग्लैंड का राष्ट्रीय खेल बन गया, फिर 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में यह खेल पूरी दुनिया में फैलने लगा. 1844 में पहली बार अन्तराष्ट्रीय तौर पर एक दिवसीय क्रिकेट मैच खेला गया था, जो अमेरिका एवं कैनेडा के बीच हुआ था. जबकि 1877 में पहली बार अन्तराष्ट्रीय तौर पर पांच दिवसीय टेस्ट क्रिकेट मैच खेला गया था, जो इंगलैंड एवं ऑस्ट्रेलिया बीच हुआ था. क्रिकेट फुटबॉल के बाद दूसरा सबसे लोकप्रिय दर्शक खेल है.

भारत में जब ब्रिटिश शासन था, तब वे ही इस खेल को भारत लाये थे. ब्रिटिश शासक बहुत स्मार्ट थे, वे भारत के राजाओं और नबाबों का ध्यान सत्ता और अपने राज्य से हटाने के लिए इस खेल को उनके बीच लाये थे. ब्रिटिशों ने ये खेल राजाओं, शासकों के साथ खेला, उन्हें इसमें इतना मशरूफ कर दिया कि उनका ध्यान सत्ता से हटने लगा. और फिर इसी बात का फायदा ब्रिटिश शासकों को हुआ. इसके बाद से ही यह खेल भारत के साथ साथ, पाकिस्तान, बांग्लादेश और हमारे आस पास के अन्य देशों में भी प्रसिध्य होने लगा था. आजादी के पहले से ही क्रिकेट को भारत में पसंदीदा खेल माना जाने लगा था. यह खेल पहले भारत में आम खेल की तरह ही खेला जाता था, 1864 में मद्रास और कलकत्ता के बीच पहली बार उच्च स्तर का क्रिकेट मैच खेला गया था, जिसे फर्स्ट क्लास क्रिकेट नाम दिया गया.

क्रिकेट खेल के बारे में जानकारी (Cricket information)

क्रिकेट का खेल दो टीम के बीच होता है, जिसमें प्रत्येक में 11 खिलाड़ी होते है. इस खेल के रूल्स बहुत साधारण एवं आसान है, इसलिए इसे बच्चे भी बहुत पसंद करते है और सबसे ज्यादा खेलना पसंद करते है. क्रिकेट का मैच एक बड़े मैदान में खेला जाता है, जहाँ बीच में पीच होती है, जिस पर खिलाड़ी खेल खेलते है. इसके दोनों ओर 3-3 विकेट गड़ाए जाते है, उसके उपर गिल्ली रखी होती है. सबसे पहले 2 टीम के बीच टॉस होता है, जो टॉस जीतता है, वो टीम निश्चय करती है कि उसे पहले बैटिंग करनी है या बॉलिंग. फिर बैटिंग के लिए 2 खिलाड़ी मैदान में उतरते है, जबकि बॉलिंग एक खिलाड़ी करता है, और उस टीम के बाकि सदस्य फील्डिंग करते है. इसके अलावा मैदान में निर्णय लेने के लिए 2 एम्पायर भी रहते है, इसके अलावा मैदान से बाहर एक तीसरा एम्पायर भी होता है. जब मैदान में 2 एम्पायर निर्णय लेने में असमर्थ होते है, तब वे इशारा करते है तो तीसरा एम्पायर रिकॉर्डिंग में देख उसका निर्णय लेता है. क्रिकेट मैच के मुख्य नियम पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

क्रिकेट के प्रकार (Cricket Types) – समय के साथ क्रिकेट खेल में भी नई नई चीजें आ गई है. अन्तराष्ट्रीय मैच हर साल होते है, जिसे ‘इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल’ (ICC) द्वारा आयोजित किया जाता है. आईसीसी क्रिकेट के नियमों को बनाती है और टीमों का चयन करती है. आईसीसी ये भी सुनियोजित करती है कि सभी टीम क्रिकेट के नियमों का पालन कर रही है या नहीं. क्रिकेट की सबसे बड़ी प्रतियोगिता ‘वर्ल्ड कप’ होती है, जो हर चार में होती है. वर्ल्ड कप का इंतजार हर खिलाड़ी और देखने वाले दर्शक को होता है. कई लोग हमेशा क्रिकेट मैच नहीं देखते है, लेकिन वर्ल्ड कप में खासी दिलचस्पी रखते है. वर्ल्ड कप के लिए भारतवासी तो बहुत ही उत्साहित रहते है.

  • टेस्ट मैच यह पांच दिवसीय मैच होता है, जिसमें ओवर पहले से निश्चित नहीं होते है. 5 दिन का यह मैच बिना किसी निर्णय के भी ख़त्म हो जाता है.
  • एक दिवसीय मैच 50 ओवरों का यह मैच एक दिन का होता है, जिसमें उसी दिन खेल का फैसला हो जाता है.
  • 20-20 क्रिकेट क्रिकेट का यह प्रकार ज्यादा पुराना नहीं है. थोड़े समय पहले ही यह आया और लोगों के बीच काफी प्रचलित हो गया. 20-20 में बीस ओवर का मैच होता है, जो 3-4 घंटे में समाप्त हो जाता है, इसे आजकल खिलाडियों के साथ साथ दर्शक भी काफी एन्जॉय करते है.
  • इंडियन प्रीमियर लीग 20-20 क्रिकेट मैच की तर्ज पर ही इंडियन प्रीमियर लीग की शुरुवात हुई. इसमें दुनिया भर के खिलाड़ी हिस्सा लेते है. इन खिलाड़ियों का चयन भारत में अलग अलग राज्यों द्वारा बनी टीम के द्वारा होता है. फिर इन 10-12 टीम के बीच 2 महीनों तक मैच होते है, और कई चरणों से गुजरने के बाद फाइनल मैच 2 टीमों में होता है. जो टीम विजयी रहती है, उसे एक बहुत बड़ा पुरुस्कार मिलता है. कहते है आईपीएल एक ऐसा गेम है, जिसके द्वारा खिलाडियों को अच्छा खासा पैसा कमाने का मौका मिलता है, इसके साथ ही टीम के मालिक की भी जेब भारी होती है. आईपीएल मैच के बारे में यहाँ पढ़ें.
  • इंडोर क्रिकेट
  • इंटर क्रिकेट

क्रिकेट मैच का आँखों देखा वर्णन

क्रिकेट मैच एक ऐसा मैच है जो व्यस्त से व्यस्त इन्सान को भी अपनी ओर आकर्षित करता है. भारत के लगभग हर गली, मोहल्ले में यह मैच खेला जाता है. मैदान हो न हो, बच्चे – बड़े मुख्य रूप से लड़के कही पर भी इस खेल को खेलना शुरू कर देते है. मुझे नहीं लगता भारत में कोई ऐसा मोहल्ला होगा, जहाँ मोहल्ले के लड़कों ने क्रिकेट के दौरान खिड़की न तोड़ी हो. इन्ही गली मोहल्लों में देश के महान क्रिकेटर छुपे रहते है. कपिल देव, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर, अजरुद्दीन,  विराट कोहली, सौरभ गांगुली, राहुल द्रविड़, महेंद्र सिंह धोनी आदि ऐसे महान खिलाडियों के नाम है, जिन्होंने अपने मोहल्ले में इस खेल की शुरुवात की और आज भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाडियों में से एक बन गए है. विराट कोहली के जीवन परिचय को यहाँ पढ़ें.

मैं अपनी बात करूँ तो पहले मुझे क्रिकेट खासा पसंद नहीं था, लेकिन भाइयों को खेलता देख धीरे धीरे इसकी ओर आकर्षित हुई. पहली बार मैंने टीवी पर 1999 में वर्ल्ड कप मैच देखा, जिसे देख कर और गहराई इस खेल को समझ पाई और फिर यह मेरा पसंदीदा खेल बन गया. 2004 के वर्ल्ड के तो हर मैच को मैंने पूरा पूरा देखा. टीवी पर मैच देखने का तो अलग मजा है ही, लेकिन लाइव किसी मैदान में यह मैच देखने से एक बहुत अलग ही अनुभव मिलता है. हजारों लोगों की भीड़ में, दोनों टीम के समर्थक होते है जो अपने अपने टीम की जीत पर चिल्ला उठते है. टीवी पर जब इन दर्शकों के उत्साह को देखती तो मेरा भी मन करता कि काश कोई क्रिकेट मैच मैदान में बैठ कर देख सकूँ. मेरी इस इच्छा को मेरे भाई ने पूरा किया और हमारे शहर में होने वाले राज्य स्तर के मैच को दिखाने ले गया.

राज्य स्तर का मैच होने के कारण ग्राउंड में काफी भीड़ थी, लेकिन संचालकों ने दर्शकों के अच्छे से बैठने की व्यवस्था की थी. भीड़ को सँभालने और सुरक्षा के लिए स्पेशल पुलिस भी बुलवाई गई थी. मैदान में जाने के लिए हमारे पास टिकट थी, तो वहां घुसने से पहले भीड़ में से होकर हम गेट पर पहुंचें, वहां टिकट की चेकिंग हुई. कई जगह खेल के मैदान में मेटल डिटेक्टर भी लगे रहते है, जो सुरक्षा की दृष्टि से लगाये जाते है. अंदर जाकर हम सीट पर बैठ गए. यह मैच रोटरी क्लब और लायन क्लब के बीच हो रहा है. दोनों के बीच सबसे पहले टॉस हुआ, जो रोटरी क्लब ने जीता और उसने बैटिंग करने का फैसला किया.  यह मैच 20 ओवरों का ही था. रोटरी क्लब के 2 खिलाड़ी मैदान में उतरते है, उसी बीच लायन क्लब के खिलाड़ी फील्डिंग की तैयारी करते है. रोटरी क्लब की शुरुवात धीमी रही, शुरू के चार ओवरों में ही इनके 2 खिलाड़ी आउट हो जाते है.

इसके बाद आये खिलाड़ी अच्छे रनों की पारी खेलना शुरू करते है, वे सामने वाले टीम के गेंद्वाजों को धोते नजर आते है. 10 ओवर मतलब आधे मैच के बाद स्कोर 90 रन 2 विकेट का होता है. अब लायन टीम अपनी तरफ से स्पिनर गेंदबाज आते है. वे रोटरी क्लब के बल्लेबाज पर भारी पड़ जाते है तो उनके हाथ 1 विकेट लगता है. मैच आगे बढ़ता जाता है, और अंत में 20 ओवरों में रोटरी टीम 175 रन, 5 विकेट के नुकसान में बना पाती है. इसके बाद 20 min का ब्रेक होता है.

ब्रेक के बाद लायन टीम बैटिंग के लिए आती है, इनकी शुरुवात अच्छी होती है. 5 ओवर में ही इनके 50 रन बन जाते है. फिर रोटरी क्लब टीम अपने स्पिनर को बुलाते है, जिससे उन्हें 2 विकेट हाथ लगते है. विकेट के नुकसान के बावजूद लायन क्लब रन बनाता चला जाता है, और 15 ओवर में 150 रन, 7 विकेट के नुकसान में बना लेता है. मैच के इस मोड़ में सभी लायन क्लब के साथ थे, सभी को लग रहा था मैच लायन क्लब द्वारा जीता हुआ है. लेकिन क्रिकेट की यही माया है, आखिर तक नहीं कहा जा सकता कौन जीतेगा कौन हारेगा. मैच कब पलट जाये कुछ नहीं कहा जा सकता है. मैच आगे बढ़ा 16 ओवर होने पर 155 रन बने. 17 ओवर पर 158 रन. अभी भी 18 बॉल में 18 रन बनाने थे, जो ऐसे बहुत बड़ा मुकाम नहीं था. 18 ओवर में लायन टीम के 163 रन बन गए. अब 12 बॉल में 13 रन चाहिए थे.

19 ओवर शुरू होता है, पहली 4 बॉल में 2 रन मिलते है, लेकिन अगली बॉल में खिलाड़ी क्लीन बोल्ड हो जाता है. विकेट गिरते ही, मैदान में समर्थकों के चिल्लाने की आवाज गूँज उठती है, रोटरी टीम के मायूस समर्थकों के चेहरे पर एक उम्मीद की लहर दिखाई देने लगती है. अभी भी लायन टीम को 6 बॉल में 11 रन बनाने थे, और अपने 2 विकेट सँभालने थे. 20 ओवर शुरू होता है, पहली बॉल में नो रन, दूसरी बाल में 1 रन मिलता है. तीसरी बॉल भी खाली जाती है. चौथी बाल में बल्लेबाज गेंद उछाल देता है, छक्के की आस में सब चिल्ला उठते है, लेकिन ये क्या ये तो कैच हो जाता है. पांचवी बॉल के लिए नया खिलाड़ी आता है, जो बॉल को उछालते हुए 4 रन मारता है.

अब आखिरी बॉल, आखिरी विकट एवं 6 रन, यह मैच बहुत ही रोचक मोड़ पर आ जाता है. मैं बस मैदान में टकटकी लगाये बैठी रहती हूँ, गेंदवाज बालिंग करता है, खिलाड़ी बॉल को उछालता है, लेकिन बॉल फील्डर के हाथ में आ जाती है. मुझे लगता है लायन टीम मैच हार गई, लेकिन तभी मैदान में एम्पायर तीसरे एम्पायर के फैसले के लिए इशारा करता है.  दरअसल जो फील्डर कैच लेता है, उसका पैर बाउंड्री में टच हो जाता है. तीसरा एम्पायर रिकॉर्डिंग को गहराई से देखता है, और फिर खिलाड़ी को नोट आउट करते हुए, छक्का घोषित कर देता है. आख़िरकार मैच लायन क्लब द्वारा जीत लिया जाता है. वैसे मैं किसी टीम के साइड नहीं थी, लेकिन इतने रोमांचक भरे मैच के बाद मैं खुश थी कि लायन क्लब जीता. जितने वाली टीम को पुरुस्कार स्वरुप राशी और ट्रोफी दी जाती है. इसके साथ ही मैन ऑफ़ दी मैच विजेता टीम के खिलाड़ी को मिलता है, जिसने 30 बॉल में 75 रन बनाये थे.

भारत में क्रिकेट मैच की दीवानगी –

भारत में क्रिकेट के मैच का महत्व किसी त्यौहार से कम नहीं होता है. किसी मैच का फाइनल हो या वर्ल्ड कप सभी अपनी टीवी के सामने बैठ जाते है. लोग ऑफिस, स्कूल, कॉलेज से छुट्टी ले लेते है, कई बार तो इन जगहों पर अवकाश घोषित हो जाता है. सड़कें सुनसान हो जाती है, दुकानों में जहाँ टीवी, रेडियो रहते है वहां सब इक्कठे हो जाते है. हर कोई मैच का स्कोर जानने के लिए उतारू रहता है. मुख्य रूप से अगर मैच भारत पाकिस्तान का तो पूरे देश में त्यौहार सा माहौल हो जाता है. मैच जीतने पर सड़कों पर उतर कर सब इसका जश्न बनाते है, ढोल नगाड़े, बम पटाखे फोड़े जाते है. वर्ल्ड कप के दौरान तो मंदिर मस्जिद में स्पेशल प्राथनाएं होती है, लोग जीत के लिए स्पेशल पूजा करते है. भारत ने जब 2011 में वर्ल्ड कप जीता था, उस एतिहासिक पल में पूरा भारत जश्न में डूब गया था. भारत में क्रिकेट मैच के लिए तो लोग दीवाने है ही, इस मैच के खिलाड़ी मुख्य रूप से सचिन तेंदुलकर  की तो पूजा की जाती है. सचिन तेंदुलकर जीवन परिचय यहाँ पढ़ें.

भारत में क्रिकेट के प्रति दीवानगी तो है ही, लेकिन अगर भारत कोई अहम मैच हार जाता है, या कोई खिलाड़ी अच्छा प्रदर्शन नहीं करता है तो उसके खिलाफ लोग बहुत बात करते है. सोशल मीडिया में गलत गलत बातें करते है, सड़कों में उतर कर पुतला जलाते है. ये तरीका बहुत ही गलत है. खेल होता ही है किसी की जीत और किसी की हार के लिए. खेल भावना के साथ ही मैच देखना एवं खेलना चाहिए.

आजकल क्रिकेट मैच में भी भ्रष्टाचार बढ़ते जा रहा है. कुछ लोग पैसों के लिए इस खेल को ख़राब कर रहे है. किसी मुख्य मैच के समय कुछ बदमाश और भ्रष्ट लोग मैच में बोली लगते है और आम लोगों को भी इसमें  शामिल करते है. आईसीसी और सरकार इस ओर लगातार कार्य कर रही है, ताकि खेल को खेल की तरह खेला जाये और किसी की भावना को ठेस न पहुंचे. भ्रष्टाचार एक समस्या, निबंध, कविता पढने के लिए यहाँ क्लिक करें.

Vibhuti

विभूति दीपावली वेबसाइट की एक अच्छी लेखिका है| जिनकी विशेष रूचि मनोरंजन, सेहत और सुन्दरता के बारे मे लिखने मे है| परन्तु साईट के लिए वे सभी विषयों मे लिखती है|

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क्रिकेट हा क्रिकेट मैदानावर प्रत्येकी 11 खेळाडूंच्या दोन संघांदरम्यान, चेंडू(बाॅल) आणि फळी (बॅट) ने खेळला जाणारा मैदानी खेळ आहे. क्रिकेटच्या मैदानाच्या मध्यभागी एक २२-यार्ड-लांबीची मुख्य खेळपट्टी असते. तिच्या दोन्ही टोकांना प्रत्येकी ३ लाकडी यष्टी असतात. एक संघ फलंदाजी संघ म्हणून खेळतो. हा संघ जास्तीत जास्त धावा करण्याचा प्रयत्न करतो, आणि त्यांचा प्रतिस्पर्धी संघ क्षेत्ररक्षण करतो. खेळाच्या प्रत्येक टप्प्याला डाव असे म्हणतात. संघाचे दहा फलंदाज बाद झाल्यानंतर किंवा निर्धारित षटके पूर्ण झाल्यानंतर दोन्ही संघ आपापली भूमिका बदलतात. एका किंवा दोन डावांत अतिरिक्त धावा मिळून ज्या संघाची धावसंख्या जास्त असेल तो विजेता संघ म्हणून घोषित होतो.

प्रत्येक सामन्याच्या सुरुवातीला, दोन फलंदाज आणि अकरा क्षेत्ररक्षक खेळाच्या मैदानात उतरतात. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील [गोलंदाज] खेळपट्टीच्या एका टोकापासून, दुसर्‍या टोकाला असलेल्या फलंदाजाकडे (या फलंदाजाला स्ट्रायकर म्हणतात.) जेव्हा चेंडू फेकतो, तेव्हा खेळाला सुरुरवात होते. स्ट्रायकर खेळपट्टीवर यष्टीसमोर चार फुटांवर (खेळपट्टीच्या या क्षेत्राला क्रिज म्हणतात.) क्रिजमध्ये उभा राहतो. बॅटचा वापर करून चेंडू यष्ट्यांवर आदळण्यापूर्वी अडवणे आणि धावा करता येण्याइतपत टोलवणे ही फलंदाजाची भूमिका असते. दुसरा फलंदाज (नॉन-स्ट्रायकर), खेळपट्टीच्या दुसर्‍या टोकाला गोलंदाजाजवळ क्रिजच्या आतमध्ये उभा राहतो. बाद झालेल्या फलंदाजाला मैदान सोडावे लागते, आणि त्याच्या संघातील दुसरा खेळाडू त्याची जागा घेतो. फलंदाजाला धावा करू न देणे आणि त्याला बाद करणे ही गोलंदाजाची उद्दिष्ट्ये असतात. एकाच गोलंदाजाने एका मागोमाग एक सहा वेळा चेंडूफेक केल्यानंतर चेंडूफेकीचे एक षटक पूर्ण होते. त्यानंतरचे षटक दुसरा गोलंदाज, खेळपट्टीच्या दुसर्‍या बाजूने टाकतो.

फलंदाज बाद होण्याच्या सामान्य पद्धती[संपादन]

  • त्रिफळाचीत : गोलंदाजाने फेकलेला चेंडू थेट यष्ट्यांवर जाऊन आदळला की फलंदाज त्रिफळाचीत होतो..
  • पायचीत : जेव्हा फलंदाज बॅटऐवजी स्वतःच्या शरीराच्या कोणत्याही अवयवाचा वापर करून चेंडू यष्ट्यांवर आदळण्यापासून रोखतो, तेव्हा तो पायचीत होतो.
  • झेलबाद : जेव्हा फलंदाजाने टोलविलेला चेंडू हवेत उडून जमिनीवर पडण्याआधी क्षेत्ररक्षक झेलतो, तेव्हा फलंदाज झेलबाद होतो.
  • धावचीत : फलंदाज क्रीजच्या बाहेर असताना क्षेत्ररक्षकाने चेंडू पकडला आणि तो यष्ट्यांवर मारण्यात यश मिळविले तर फलंदाज बाद होतो ह्याला धावचीत असे म्हणतात.


FFS dghshdg==धावा मिळवण्याच्या पद्धती== धावा दोन प्रकारे जमविल्या जातात: चेंडू पुरेशा ताकदीने टोलवून सीमारेषेपार करून किंवा क्षेत्ररक्षकाने चेंडू अडवून यष्टीच्या दिशेने फेकण्याआधी दोन्ही फलंदाजांनी एकाचवेळी धावून आपल्या जागेवरून खेळपट्टीच्या दुसर्‍या टोकाला पोहोचून. फलंदाज क्रीजमध्ये पोहोचण्याआधी क्षेत्ररक्षकाने चेंडू पकडला आणि यष्ट्यांवर मारण्यात यश मिळविले तर फलंदाज बाद होतो (ह्याला धावचीत असे म्हणतात). मैदानावर निर्णय देण्याची भूमिका दोन पंच पार पाडतात.

क्रिकेटचे कायदे करण्याची जबाबदारी आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट समिती (ICC) आणि मेरीलिबॉन क्रिकेट क्लब (MCC) यांच्यावर आहे. क्रिकेटचे ट्वेंटी२० (ज्यामध्ये १ डाव हा २० षटके म्हणजेच १२० चेंडू इतका असतो) पासून ते कसोटी क्रिकेट (जो पाच दिवस आणि अमर्यादित षटकांचा असतो आणि प्रत्येक संघ प्रत्येकी दोन डाव खेळतो) पर्यंत अनेक प्रकार आहेत. परंपरागत क्रिकेट संपुर्णतः सफेद रंगाची साधने (कपडे, पॅड, ग्लोव्ह्ज) वापरुन खेळले जाते, परंतू मर्यादित षटकांचे क्रिकेट खेळताना, खेळाडू क्लब किंवा संघाच्या रंगाचे कपडे परिधान करतात. मूलभूत साधनांच्या संचाशिवाय, काही खेळाडू चेंडू लागून होणार्‍या दुखापतींपासून बचाव करण्यासाठी, संरक्षक साधने वापरतात, जी कॉर्क पासून बनवलेली, कातडी अच्छादन असलेली आणि अगदी टणक असतात. क्रिकेटची उत्पत्ती कधी झाली हे अनिश्चित असले तरीही, सर्वप्रथम १६व्या शतकात दक्षिण-पूर्व इंग्लंडमध्ये क्रिकेटच्या नोंदी केल्या गेल्या. ब्रिटीश साम्राज्याच्या विस्तारामुळे क्रिकेटचा प्रसार जगभरात झाला, आणि पहिला आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट सामना १९व्या शतकाच्या मध्यावर खेळवला गेला. क्रिकेट नियामक मंडळ-आयसीसीचे १०० हून अधिक सभासद आहेत, त्यापैकी १० पूर्ण सभासद आहेत जे कसोटी क्रिकेट खेळतात. ऑस्ट्रेलेशिया, ब्रिटन, भारतीय उपखंड, दक्षिणी आफ्रिका आणि वेस्ट इंडीजमध्ये क्रिकेटचा चाहतावर्ग मोठ्या प्रमाणावर आहे. स्वतंत्रपणे आयोजन आणि खेळल्या जाणार्‍या, महिला क्रिकेटने सुद्धा आंतरराष्ट्रीय दर्जा प्राप्त केला आहे.

व्युत्पत्ती[संपादन]

"क्रिकेट" ह्या संज्ञेबद्दल अनेक शब्द स्त्रोत म्हणून सुचवले गेले आहेत. खेळाबद्दल सर्वात आधीचा निश्चित संदर्भ मिळतो तो १५९८ मध्ये, जेव्हा खेळाला creckett म्हटले जात असे.[१] जुन्या इंग्रजी भाषेत नावाचा एक संभाव्य स्त्रोत आहे, cricc किंवा cryce म्हणजेच crutch किंवा काठी.[२] प्रसिद्ध लेखक सॅम्युएल जॉन्सनच्याशब्दकोशामध्ये, त्याने "cryce, Saxon, a stick" वरुन क्रिकेट हा शब्द तयार केला.[३] जून्या फ्रेंच भाषेत, criquet ह्या शब्दाचा अर्थ एका प्रकारची छडी किंवा काठी असा असावा असे दिसते.[२] दक्षिण-पुर्व इंग्लंड आणि बुरुंडी किंवा बूर्गान्यच्या सरदाराच्या ताब्यातील मुलूख आणि तेव्हाचा फ्लँडर काऊंटी यांच्यामध्ये असलेल्या घनिष्ट मध्ययुगीन व्यापारासंबंधावरुन, असे दिसते की हे नाव मिडल डच वरुन घेण्यात आले असावे[४]krick(-e), म्हणजे बाक असलेली काठी.[२] आणखी एक संभाव्य स्त्रोत म्हणजे मिडल डच शब्द krickstoel, म्हणजे चर्च मध्ये गुडघे टेकवण्यासाठी वापरले जाणारे लांब कमी उंचीचा स्टूल किंवा बाक, ज्याचे साम्य पुर्वी क्रिकेटमध्ये वापरल्या जाणार्‍या दोन यष्टी असणारी लांब खेळपट्टीशी होते.[५]बॉन विद्यापीठातील युरोपीय भाषांचे तज्ञ हेनर गिलमेइस्टरच्या मते, हॉकी साठी वापरला जाणारा वाक्प्रचार met de (krik ket)sen (अर्थात, "काठीसह पाठलाग") ह्यावरुन "cricket" हा शब्द घेतला गेला असावा.[६] डॉ गिलमेइस्टर यांच्या मते फक्त नावच नाही तर हा खेळच मूळतः फ्लेमिश आहे.[७]

इतिहास[संपादन]

मुख्य पान: क्रिकेटचा इतिहास

क्रिकेटची सुरवात १३०१ च्या सुरवातीला झाल्याचे अनेक बनावट आणि/किंवा त्याला आधार असलेल्या पुराव्यांची उणीव आहे. तरीही क्रिकेटबद्दल १६व्या शतकातील, इंग्लंडमधील ट्युडर काळापर्यंतचे पुरावे मिळतात. सर्वात आधीचे क्रिकेट खेळले गेल्याबद्दलचे नक्की संदर्भ मिळतात ते, १५९८मधील न्यायालयीन कारवाईतील पुराव्यांमध्ये, ज्यामध्ये गिल फोर्डच्या सार्वजनिक जमिनीवर १५५०च्या सुमारास creckettचा खेळ खेळला गेल्याची नोंद आहे. सोमवार, १७ जानेवारी १५९७ रोजी गिलफोर्ड कोर्टातील सुनावणी दरम्यान, ५९ वर्षीय कोरोनर, जॉन डेरिक जेव्हा ५० वर्षांपूर्वी फ्री स्कूल ऑग गिलफोर्डचा विद्यार्थी असताना दिलेल्या साक्षीमध्ये म्हणतो, "hee and diverse of his fellows did runne and play [on the common land] at creckett and other plaies."[३][८]

क्रिकेट हा मूलतः लहान मुलांचा खेळ आहे असा समज होता, परंतू १६११ मधील काही संदर्भ[३] असे दर्शवतात की प्रौढांनी हा खेळ खेळण्यास सुरवात केली आणि सर्वात जुना ज्ञात इंटर-पॅरिश किंवा व्हिलेज क्रिकेट सामना त्याकाळी खेळवला गेला.[९] १६२४ मध्ये, जॅस्पर व्हिनॉल नावाचा खेळाडू ससेक्समधील दोन रहिवासी संघांदरम्यानच्या सामन्यामध्ये डोक्याला चेंडू लागून मरण पावला होता.[१०] १७ शतकामध्ये, दक्षिण-पूर्व इंग्लंडमध्ये खेळाचा प्रसार झाल्याचे अनेक संदर्भ सापडतात. शतकाच्या शेवटापर्यंत, क्रिकेट उच्च असा एक संघटित खेळ म्हणून नावारुपास आला आणि इंग्लंडच्या जीर्णोद्धारानंतर १६६० मध्ये पहिला व्यावसायिक खेळ म्हणून पाहिला जावू लागला असे मानले जाते. एका वर्तमानपत्रातील अहवाल सांगतो की, १६९७ मध्ये ससेक्स मध्ये उच्च गटासाठी "ग्रेट क्रिकेट मॅच" म्हणून ओळखला जाणारा सामना प्रत्येकी ११ खेळाडूंच्या संघांदरम्यान खेळवला गेला. क्रिकेट सामन्याचा हा सर्वात जूना आणि महत्त्वाचा संदर्भ आहे.[११]

१८ व्या शतकात खेळामध्ये बरेच परिवर्तन झाले. स्वत:चे "निवडक XI" संघ असलेल्या श्रीमंतांनी खेळलेला जुगार (बेटिंग) हा ह्या सुधारणांचा एक महत्वाचा भाग होता. १७०७ पासूनच क्रिकेट हा लंडनमधील एक खूप महत्त्वाचा खेळ बनला होता आणि शतकाच्या काही मधल्या वर्षांमध्ये लोक मोठ्या प्रमाणावर फिन्सबरीच्या आर्टिलरी मैदानावर सामन्यांसाठी जात असत. खेळाच्या एक गडी प्रकाराने खूप लोकांना आणि जुगाराला आकर्षित केले, १७४८च्या मोसमात हा प्रकार लोकप्रियतेच्या सर्वोच्च शिखरावर होता. सन १७६०च्या सुमारास गोलंदाजीच्या तंत्रामध्ये मोठी उत्क्रांती झाली. गोलंदाजांनी चेंडू घरंगळत टाकण्याऐवजी चेंडूचा टप्पा टाकू लागले. त्यामुळे बॅटच्या रचनेमध्ये सुद्धा अमुलाग्र बदल झाले कारण, उसळणार्‍या चेंडूचा सामना करण्यासाठी जुन्या "हॉकी स्टीक"च्या आकाराच्या बॅट ऐवजी आधुनिक सरळ बॅटची गरज होती. १७६० मध्ये हॅम्ब्लेडॉन क्लबची स्थापना झाली आणि १७८७ मध्ये मेरीलिबॉन क्रिकेट क्लब (MCC) ची निर्मिती व जुने लॉर्ड्स मैदान खुले होईपर्यंत पुढची वीस वर्षे, हॅम्ब्लेडॉन क्रिकेटमधील महानतम क्लब आणि क्रिकेटचा केंद्र बिंदू होता. एमसीसी लवकरच क्रिकेटचा एक अव्वल क्लब आणि क्रिकेटच्या नियमांचा पालक बनला. १८ व्या शतकाच्या नंतरच्या काळात तीन यष्टी असलेली खेळपट्टी आणि पायचीतचा समावेश असलेले नवे नियम लागू करण्यात आले.

१९व्या शतकात अंडरआर्म गोलंदाजीची जागा आधी राउंडआर्म आणि नंतर ओव्हरआर्म गोलंदाजीने घेतली. ह्या दोन्ही सुधारणा वादग्रस्त होत्या. परगणा किंवा काउंटी स्तरावरच्या खेळ संघटना काउंटी क्लब तयार करु लागल्या आणि १८३९ मध्ये ससेक्सची स्थापना झाली, आणि अखेर १८९० मध्ये काउंटी अजिंक्यपद स्पर्धा सुरु झाली. त्याचदरम्यान ब्रिटीश साम्राज्याने क्रिकेटचा खेळ परदेशात पोहोचण्यासाठी महत्त्वाची भूमिका बजावली आणि १९व्या शतकाच्या मध्यावर क्रिकेट भारत, उत्तर अमेरिका, कॅरेबियन, दक्षिण आफ्रिका, ऑस्ट्रेलिया आणि न्यूझीलंडमध्ये खूप लोकप्रिय होत गेला. १८४४ मध्ये, सर्वात पहिला आंतरराष्ट्रीय सामना अमेरिका आणि कॅनडा ह्या संघांदरम्यान खेळवला गेला. १८५९ मध्ये, इंग्लंडचा संघ, उत्तर अमेरिकेच्या, सर्वात पहिल्या परदेशी दौर्‍यावर गेला.

परदेश दौरा करणारा पहिला ऑस्ट्रेलियाई संघ होता तो अबोरिजिनल स्टॉकमेन (Aboriginal stockmen), जो काउंटी संघांविरुद्ध सामने खेळण्यासाठी १८६८ साली इंग्लंडला गेला होता..[१२] १८६२ मध्ये, इंग्लडचा संघ पहिल्यांदा ऑस्ट्रेलियाच्या दौर्‍यावर गेला. १९व्या शतकातील सर्वात प्रसिद्ध खेळाडू होता विल्यम गिल्बर्ट ग्रेस, ज्याने त्याच्या दिर्घ आणि प्रभावी कारकिर्दीची सुरवात १८६५ मध्ये केली.

१८७६-७७ मध्ये, इंग्लंडचा संघ ज्या कसोटी सामन्याला पूर्वलक्षी प्रभावाने सर्वात पहिला कसोटी सामना म्हटले जाते अशा ऑस्ट्रेलियाविरुद्धच्यामेलबर्न क्रिकेट मैदानावरील सामन्यात सहभागी झाला. इंग्लंड आणि ऑस्ट्रेलिया यांच्यातील स्पर्धेने १८८२ साली द ॲशेसला जन्म दिला आणि आजतागायत ही स्पर्धा कसोटी क्रिकेटमध्ये सर्वात प्रसिद्ध स्पर्धा राहिली आहे. १८८८-८९ पासून जेव्हा दक्षिण आफ्रिकेचा संघ इंग्लंडविरुद्ध खेळला तेव्हा पासून कसोटी क्रिकेटने हातपाय पसरायला सुरवात केली.

पहिल्या महायुद्धाच्या आधीची दोन दशके ही "गोल्डन एज ऑफ क्रिकेट" म्हणून ओळखली जातात. युद्धामुळे झालेल्या एकंदरीत नुकसानाच्या अर्थी ते एक नाव आहे, परंतू ह्या काळात अनेक महान खेळाडू आणि अविस्मरणीय सामने झाले, मुख्यतः काउंटी आणि कसोटी स्तरावरच्या स्पर्धांचे आयोजन झाले.

युद्धांतर्गत वर्षांवर वर्चस्व गाजवले ते एका खेळाडूने: ऑस्ट्रेलियाचा डॉन ब्रॅडमन, आकडेवारीनुसार आजवरचा सर्वात महान फलंदाज. दुसर्‍या जगातिक महायुद्धाआधी वेस्ट इंडीज, भारत आणि न्यूझीलंड आणि महायुद्धानंतर पाकिस्तान, [श्रीलंका [क्रिकेट संघ|श्रीलंका]] आणि बांगलादेश ह्या संघासोबत २०व्या शतकामध्ये कसोटी क्रिकेटची विस्तार चालूच राहिला. सरकारच्या वर्णभेदाच्या धोरणामुळे दक्षिण आफ्रिकी संघावर १९७० ते १९९२ पर्यंत बंदी घातली गेली होती.

१९६३ मध्ये क्रिकेटने जणू नव्या युगात पदार्पण केले. इंग्लंड काउंट्यांनी मर्यादित षटकांच्या सामन्यांचा प्रकार आणला. निकाल लागण्याच्या खात्रीमुळे, मर्यादित षटकांचे क्रिकेट खूपच किफायतशीर होते आणि अशा सामन्यांमध्ये वाढ झाली. पहिला आंतरराष्ट्रीय मर्यादित षटकांचा सामना १९७१ साली खेळवला गेला. आंतरराष्ट्रीय क्रिकेट नियामक मंडळाने ह्या क्रिकेट प्रकारातील क्षमता ओळखली आणि पहिल्या मर्यादित षटकांच्या सामन्याच्या क्रिकेट विश्वचषकाचे आयोजन १९७५ मध्ये केले. २१व्या शतकात मर्यादित षटकांच्या प्रकारामध्ये ट्वेंटी२० क्रिकेटची सुरवात करण्यात आली. हा प्रकार अल्पावधीतच लोकप्रिय झाला.

हॉकी आणि फुटबॉल सारखे काही इंग्लिश खेळ हे आंतरराष्ट्रीय स्तरावर जवळजवळ संपुर्ण जगात खेळले जातात, परंतू क्रिकेट हा मुख्यत: एके काळी ब्रिटीश साम्राज्याचा एक भाग असलेल्या देशांपुरताच मर्यादित राहिला आहे. उद्योगांच्या पुर्वीच्या विषमतेमुळे खेळाला बाहेरील देशांत जाण्यास अवघड गेले, त्यामुळे जेथे ब्रिटीशांनी राज्य केले तेथेच क्रिकेट मुळ धरु शकले. ह्या ठिकाणी हा खेळ एकतर तेथे स्थित ब्रिटीशांमुळे किंवा त्यांचे अनुकरण करणार्‍या स्थानिक उच्चभ्रूंनी लोकप्रिय केला.

नियम आणि खेळ[संपादन]

मुख्य पान: क्रिकेटचे नियम

क्रिकेट हा प्रत्येकी ११ खेळाडूंच्या दोन संघांदरम्यान बॅट आणि चेंडूने खेळला जाणारा खेळ आहे.[१३][१४] एक संघ धावा करण्याचा प्रयत्नात फलंदाजी करतो, तर दुसरा संघ गोलंदाजी आणि धावा रोखण्यासोबतच फलंदाजाला बाद करण्यासाठी चेंडू अडवतो. प्रतिस्पर्धी संघापेक्षा जास्त धावा करणे हे खेळाचे उद्दीष्ट असते. क्रिकेटच्या काही प्रकारांमध्ये, सामना जिंकण्यासाठी प्रतिस्पर्धी संघाचे सर्व खेळाडू बाद करणे गरजेचे असे, अन्यथा असा सामना अनिर्णित राहतो.

खेळाचे स्वरुप[संपादन]

क्रिकेट सामना ज्या कालावधीत विभागला जातो त्याला डाव (innings) असे म्हणतात. सामन्याच्या आधीच ठरवले जाते की प्रत्येक संघाला प्रत्येकी एक किंवा दोन डाव आहेत. डावा दरम्यान एक संघ क्षेत्ररक्षण करतो आणि दुसरा फलंदाजी. प्रत्येक डावामध्ये दोन्ही संघ फलंदाजी आणि क्षेत्ररक्षण अदलाबदली करतात. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील सर्वच्या सर्व अकरा खेळाडू मैदानावर असतात, परंतू फलंदाजी करणार्‍या संघातील एकावेळी फक्त दोन फलंदाज मैदानावर असतात. फलंदाजीची क्रमवारी बहुतेकदा सामना सुरु होण्याच्या अगदी सुरवातीला जाहीर केली जाते, परंतू ती पून्हा बदलली जावू शकते.

सामना सुरु होण्या आधी एका संघाचा कर्णधार (जो स्वत: सुद्धा त्या संघातील एक खेळाडू असतो) नाणेफेक करतो, नाणेफेक जिंकणारा कर्णधाराला आधी फलंदाजी किंवा गोलंदाजी निवडण्याचा अधिकार असतो.

क्रिकेटचे मैदान हे बहुदा वर्तुळाकार किंवा लंबवर्तुळाकार असते. मैदानाच्या मधोमध आयताकृती खेळपट्टी असते. खेळाच्या मैदानाच्या कडा सीमारेषेने अंकित केलेल्या असतात. ही सीमारेषा म्हणजे कुंपण, स्टँडचा भाग, एक दोर किंवा रंगवलेली रेषा असते

खेळपट्टीच्या दोन्ही टोकांना लाकडी लक्ष्य असते ज्याला यष्टी असे म्हणतात; दोन टोकांच्या यष्ट्यांमध्ये २२ यार्ड (२० मी)चे अंतर असते. खेळपट्टी रंगवलेल्या रेषांनी अंकित केलेली असते: यष्ट्यांच्या रेषेत गोलंदाजी क्रिस, आणि त्याच्यापुढे चार फुटांवर (१२२ सेंमी) फलंदाजी किंवा पॉपिंग क्रिस. यष्ट्यांच्या संचामध्ये तीन उभ्या यष्टी आणि त्यावर दोन लहान आडव्या बेल्स असतात. कमीत कमी एक बेल पडल्यानंतर किंवा एखादी यष्टी पडल्यानंतर (बहुतेकदा चेंडूमुळे, किंवा फलंदाजाचा हात, कपडे किंवा एखादी गोष्ट लागून) गडी बाद होतो. परंतू चेंडू लागूनही जर बेल किंवा यष्टी पडली नाही तर तो बाद ठरवला जात नाही.

कोणत्याही वेळेस प्रत्येक फलंदाज एका बाजूच्या विकेटचे (यष्ट्यांचे) मालकत्व करत असतो (तो ज्या यष्ट्यांच्या जवळ असेल त्या) आणि प्रत्यक्षात फलंदाजी करताना सोडून, जेव्हा फलंदाज त्याच्या जागी असतो, तेव्हा तो सुरक्षित असतो. म्हणजेच त्याच्या शरीराचा एखादा अवयव किंवा बॅट, तो पॉपिंग क्रिजच्या आत असताना मैदानाला टेकलेली असते. जर तो त्याच्या क्रिसच्या बाहेर असेल आणि चेंडू जिवंत असताना त्याच्याकडील यष्ट्या पडल्या तर तो बाद होतो, परंतू दुसरा फलंदाज सुरक्षित असतो.[१५]

दोन फलंदाज खेळपट्टीच्या विरोधी बाजूला आपापली जागा घेतात. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील एक खेळाडू गोलंदाज, खेळपट्टीच्या एका बाजूने दुसर्‍या बाजूला उभ्या असलेल्या स्ट्राईकिंग फलंदाजाकडे गोलंदाजी करतो. गोलंदाजाच्या बाजूकडील फलंदाजाला नॉन-स्ट्राईकर म्हणतात, आणि तो त्याच्या बाजूच्या क्रिसच्या मागे उभा राहतो. थोडी फार जोखीम घेऊन, फलंदाजाला त्यांच्या क्रीसमधून बाहेर येण्याची परवानगी असते. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील एक खेळाडू, यष्टिरक्षक, स्ट्रायकरच्या यष्ट्यांमागे उभा राहतो.

क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील इतर नऊ खेळाडू खेळपट्टीच्या बाहेर, मैदानावर वेगवेगळ्या ठिकाणी उभे राहतात. संघाचा कर्णधार डावपेचांचा भाग म्हणून वारंवार क्षेत्ररक्षणात बदल करत राहतो.

मैदानावर नेहमी दोन पंच असतात. गोलंदाजाच्या बाजूला एक आणि पॉपिंग क्रीसच्या बाजूला स्क्वेयर लेगजवळ दुसरा.

दोन फलंदाज खेळपट्टीच्या विरोधी बाजूला आपापली जागा घेतात. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील एक खेळाडू गोलंदाज, खेळपट्टीच्या एका बाजूने दुसर्‍या बाजूला उभ्या असलेल्या स्ट्राईकिंग फलंदाजाकडे गोलंदाजी करतो. गोलंदाजाच्या बाजूकडील फलंदाजाला नॉन-स्ट्राईकर म्हणतात, आणि तो त्याच्या बाजूच्या क्रिसच्या मागे उभा राहतो. थोडी फार जोखीम घेऊन, फलंदाजाला त्यांच्या क्रीसमधून बाहेर येण्याची परवानगी असते. क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील एक खेळाडू, यष्टिरक्षक, स्ट्रायकरच्या यष्ट्यांमागे उभा राहतो.

क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघातील इतर नऊ खेळाडू खेळपट्टीच्या बाहेर, मैदानावर वेगवेगळ्या ठिकाणी उभे राहतात. संघाचा कर्णधार डावपेचांचा भाग म्हणून वारंवार क्षेत्ररक्षणात बदल करत राहतो.

मैदानावर नेहमी दोन पंच असतात. गोलंदाजाच्या बाजूला एक आणि पॉपिंग क्रीसच्या बाजूला स्क्वेयर लेगजवळ दुसरा. गोलंदाज सहसा यष्ट्यांच्या काही यार्ड (मीटर) मागे जातो, पुन्हा यष्ट्यांकडे धावत येतो (ह्याला रन-अप म्हणतात) आणि गोलंदाजी क्रीस मध्ये पोहोचल्यावर हात वर करुन (ओव्हर आर्म) चेंडू सोडतो करतो. (चेंडू सोडण्याआधी जर तो क्रीसच्या पुढे गेला, किंवा कोपरातून हात जास्त वाकवला, तर तो चेंडू नो बॉल ठरवला जातो, अशा चेंडूवर फलंदाज बाद होत नाही आणि फलंदाजी करणार्‍या संघअला एक अतिरिक्त धाव मिळते. जर चेंडू यष्ट्यांच्या फलंदाजाच्या समोरुन तो जिथे पोहोचू शकणार नाही अशा प्रकारे खूप दूरुन किंवा फलंदाजाच्या अगदी मागून किंवा फलंदाजाच्या डोक्यावरुन यष्ट्यांच्या पलिकडे गेल्यास त्याला वाईड म्हटले जाते, आणि फलंदाजी करणार्‍या संघाला एक अतिरिक्त धाव दिली जाते.) चेंडू अशा प्रकारे टाकला जातो, ज्यायोगे तो खेळपट्टीवर टप्पा घेईल किंवा अगदी क्रीस मध्ये टप्पा पडेल अशा बेताने (यॉर्कर), किंवा टप्पा न पडता क्रीसच्या पलिकडे जाईल (फुल टॉस), अशा प्रकारे चेंडू टाकला जावू शकतो.

नो बॉल किंवा वाईड हे चेंडू षटकातील सहा चेंडूंमध्ये ग्राह्य धरले जात नाहीत.

चेंडू यष्ट्यांवर आदळण्यापासून वाचवणे आणि बॅटने टोलवण्याचा प्रयत्न फलंदाज करतो. (ह्या मध्ये बॅटचे हँडल किंवा दांडा आणि ग्लोव्हजचा समावेश असतो.) जर गोलंदाज, यष्ट्या उखडण्यात यशस्वी झाला तर फलंदाज बाद होतो आणि त्याला त्रिफळाचीत असे म्हणतात. जर फलंदाजाला बॅटने चेंडू अडवता आला नाही, परंतू जर शरीराच्या इतर कोणत्याही भागाचा अडथळा निर्माण होऊन, चेंडू यष्ट्यांवर जाण्यापासून अडवला गेला तर फलंदाज पायचीत, किंवा "एलबीडब्लू" म्हणून बाद होवू शकतो.

जर फलंदाजाने चेंडू व्यवस्थित टोलावला आणि चेंडूचा टप्पा न पडता क्षेत्ररक्षकाने तो थेट झेलला तर फलंदाज झेलबाद होतो. जर चेंडू गोलंदाजाचेच झेलला तर त्यास कॉट अँड बोल्ड म्हणतात; तर यष्टीरक्षकाने झेलला तर, कॉट बिहाईंड किंवा यष्ट्यांमागे झेलबाद असे म्हणतात.

जर फलंदाज चेंडू टोलवण्यात यशस्वी झाला आणि त्याचा झेल घेतला गेला नाही, तर दोन्ही फलंदाज मिळून त्यांच्या संघासाठी धावा जमावण्याचा प्रयत्न करतात. दोन्ही फलंदाज खेळपट्टीच्या लांबीइतके धावून आपापल्या जागा बदलतात आणि विरुद्ध क्रीसच्या आत आपल्या बॅट टेकवतात. दोन्ही फलंदाजांनी यशस्वीपणे आपले स्थान बदलून, क्रीसच्या आत बॅट मैदानाला टेकवल्यानंतर एक धाव मिळते. फलंदाज एक किंवा दोन धावा काढण्याचा प्रयत्न करु शकतो तसेच तो एकही धाव न काढण्याचा पर्यायही स्वीकारु शकतो. धाव काढण्याच्या प्रयत्नात बाद होण्याचा धोका असतो. जर क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघाने चेंडू पकडून फलंदाजी करणारे फलंदाज क्रिसच्या आत येण्याआधी यष्ट्या उध्वस्त करण्यात यश मिळवले, तर फलंदज धावचीत होतो. काही वेळा फलंदाज धावायला सुरवात करतात, आणि विचार बदलून पुन्हा मूळ जागी परतू शकतात.

जर फलंदाजाने टोलावलेला चेंडू टप्पा न पडता थेट सीमारेषेपार गेला तर त्याला षट्कार म्हणतात, आणि फलंदाजी करणार्‍या संघाच्या खात्यात सहा धावा जमा होतात. जर चेंडू मैदानाला स्पर्श करुन सीमारेषेपार गेला तर त्याला चौकार म्हणतात, ज्याबद्दल फलंदाजाला चार धावा मिळतात. अशा वेळी चेंडू सीमारेषेपार जाण्याआधी फलंदाजाने धावण्यास सुरवात केलेली असू शकते, परंतू चेंडू सीमारेषेपार गेल्याने, त्या धावा मोजल्या जात नाहीत.

फलंदाजा चेंडू टोलावू शकला नाही तरीही तो अतिरिक्त धावांसाठी प्रयत्न करु शकतो : त्याला बाय म्हणतात. जर चेंडू त्याच्या अंगाला लागून गेला तर त्याला लेग बाय म्हणतात.

गोलंदाजाने टाकलेला चेंडू फलंदाज टोलावू शकला नाही आणि जर तो त्याच्या क्रीसच्या बाहेर आला, तर यष्टिरक्षक चेंडू पकडून यष्टी उडवू शकतो, त्यास यष्टीचीत असे म्हणतात.

नो बॉल खेळून फलंदाज दंडापेक्षा अधिक धावा वसूल करण्याचा पर्याय निवडू शकतो. जर त्याने असे केले तर तो केवळ धावचीत बाद होवू शकतो.

फलंदाजाने धावा मिळवणे थांबविल्यानंतर चेंडू मृत होतो, आणि तो गोलंदाजाकडे गोलंदाजीसाठी पून्हा दिला जातो. जेव्हा तो रन अप घेण्यास चालू करतो तेव्हाच चेंडू पून्हा जिवंत झाला असे मानले जाते. फलंदाजांनी आपल्या जागा बदलल्या तरीही षटक पूर्ण होईपर्यंत गोलंदाज एकाच बाजूला गोलंदाजी करु शकतो.[१६]

फलंदाज बाद न होता, त्याच्या डावामधून स्वतःच्या इच्छेने निवृत्त होवू शकतो.

बाद झालेल्या फलंदाज तात्काळ मैदानातून बाहेर जातो, आणि त्याची जागा त्याच्याच संघातील दुसरा फलंदाज घेतो. मात्र, यष्ट्या पडल्या किंवा झेल घेतला गेला, तरीही फलंदाज प्रत्यक्षात तो पर्यंत बाद होत नाही जो पर्यंत क्षेत्ररक्षण करणारा संघ पंचांकडे निर्णयासाठी दाद मागत नाही. पंचांकडे दाद मागण्यासाठी गोलंदाज परंपरागत "How's that" (हाऊज दॅट) किंवा "Howzat" (हाऊझॅट) म्हणून दाद मागतात. (अनेकदा जरी फलंदाज अपीलाची गरज न वाटता मैदानातून निघून जातात). काही सामन्यांमध्ये, विशेषत: कसोटी सामन्यांमध्ये कोणताही संघ डीआरएस वापरून तिसर्‍या पंचाकडे दाद मागण्याची विनंती करतात, ज्यामध्ये टीव्ही रिप्ले तसेच हॉक-आय, हॉट-स्पॉट आणि स्निकोमीटर ह्या घटकांचा समावेश होतो.

गोलंदाजाने सहा वेळा चेंडू फेकल्यानंतर त्याचे षटक पूर्ण होते, त्याच्या जागी त्याच्या संघातील दुसरा नियुक्त गोलंदाज गोलंदाजी करतो, आणि आधीचा गोलंदाज क्षेत्ररक्षकाचे स्थान घेतो. फलंदाज आपल्याच स्थानावर राहतात, आणि नवीन गोलंदाज दुसर्‍या बाजूने गोलंदाजी करण्यात सुरवात करतो, त्यामुळे स्ट्रायकर आणि नॉन-स्ट्रायकर यांच्या भूमिका विरुद्ध होतात. यष्टीरक्षक आणि दोन्ही पंच नेहमी आपली स्थाने बदलतात आणि अनेक क्षेत्ररक्षकसुद्धा तसे करतात आणि खेळ पुढे सुरु राहतो. एका डावात गोलंदाज एकापेक्षा जास्त षटके टाकू शकतो, परंतू त्याला दोन षटके सलग टाकण्याची मुभा नसते.

डाव तेव्हा संपतो जेव्हा फलंदाज करणार्‍या संघाचे ११ पैकी १० फलंदाज बाद होतात (सर्वबाद – एक फलंदाज मात्र नेहमी "नाबाद" राहतो), किंवा निर्धारित षटके खेळून पूर्ण होतात, किंवा फलंदाजी करणारा संघ त्यांचा डाव पुरेशा धावा असल्याने घोषित करतो.

सामन्याच्या स्वरुपावरुन डाव आणि षटकांची संख्या ठरते. मर्यादित षटके नसलेल्या सामन्यात पंच, ठराविक वेळेपर्यंत सामना चालू ठेवण्या ऐवजी (दुसर्‍या संघाने वेळ वाया घालवू नये साठी) दिवसाच्या शेवटच्या सत्रात किती षटके टाकली जावे हे ठरवतात.

सर्व डाव पूर्ण झाल्यानंतर सामना संपतो. अपुर्‍या सुर्यप्रकाशामुळे किंवा खराब वातावरणामुळे पंच एखादा सामना थांबवू शकतात. परंतू सहसा सामना तेव्हा संपतो जेव्हा एक संघ त्याचा एक किंवा दोन्ही डाव पूर्ण करतो, आणि दुसर्‍या संघाकडे त्यांच्यापेक्षा जास्त धावा असतात. चार-डावांच्या सामन्यामध्ये शेवटच्या संघाला कधीकधी दुसरा डाव खेळण्याचीही गरज नसते, तेव्हा सदर संघाने डावाने विजय मिळवला असे म्हणतात. जर विजेत्या संघाचा डाव पूर्ण झाला नसेल, आणि अजूनही उदाहरणार्थ पाच फलंदाज नाबाद आहेत किंवा त्यांनी फलंदाजीच केलेली नाही तर असा संघ "पाच गडी राखून विजयी" मानला जातो. जर शेवटी फलंदाजी करणारा संघ सर्वबाद झाला आणि दुसर्‍या संघापेक्षा ५० धावा कमी करु शकला, तर विजेता संघ "५० धावांनी विजयी" झाला असे म्हटले जाते. दोन्ही संघांनचे डाव पूर्ण झाले आणि त्यांच्या धावा सुद्धा समान असतील तर अशा दुर्मिळ वेळी बरोबरी झाली असे म्हणतात.

जे सामने मर्यादित षटकांचे नसतात, ते सामने अनिर्णित राहण्याचीही शक्यता असते. सहसा सामन्याची वेळ संपते परंतू कमी धावा असलेल्या संघाचे काही फलंदाज बाद होणे अजूनही बाकी असते तेव्हा सामना अनिर्णितावस्थेत संपतो. ह्याचा सरळ प्रभाव पडतो तो संघांच्या डावपेचांवर. जेव्हा संघाने पुरेशा धावा जमवलेल्या असतात आणि प्रतिस्पर्धी संघाला बाद करण्यासाठी त्यांच्याकडे पुरेसा वेळ आहे अशी आशा असते, तेव्हा तो संघ डाव घोषित करतो. त्यांना सामना अनिर्णित होणे टाळायचे असते. परंतू ह्यामध्ये दुसरा संघ पुरेशा धावा करुन विजय मिळवण्याचा धोकासुद्धा असतो.

धावपट्टी, यष्टी आणि क्रिस[संपादन]

मुख्य पाने: खेळपट्टी, विकेट, व पॉपिंग क्रीस

हेही बघा: यष्टी (क्रिकेट)आणिबेल्स (क्रिकेट)

खेळण्याची जागा[संपादन]

क्रिकेटचा खेळ गवताळ क्रिकेट मैदानावर खेळला जातो.[१७]क्रिकेटच्या नियमांमध्ये मैदानाचा ठराविक आकार किंवा मापाबद्दल निर्देश नाहीत,[१८] परंतू, सहसा ते लंबगोलाकार असते. मैदानाच्या मधोमध एक आयताकार पट्टी असते, जी खेळपट्टी म्हणून ओळखली जाते.[१७]

खेळपट्टीचा सपाट पृष्ठभाग १० फूट (३.० मी) रुंद असतो. खेळपट्टीवर असलेले लहान गवत जसजसा सामना पुढे जातो तसतसे कमी होत जाते. त्याच प्रमाणे क्रिकेट मॅट सारख्या कृत्रिम पृष्ठभागावर सुद्धा खेळले जावू शकते. खेळपट्टीच्या दोन्ही टोकांना, २२ यार्ड (२० मी) अंतरावर, लाकडी लक्ष्य ठेवलेले असते, ज्याला विकेट असे म्हणतात. गोलंदाजी किंवा क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघासाठी हे एक लक्ष्य असते आणि फलंदाजी करणारा संघ, धावा जमवण्यासाठी विकेटचे रक्षण करतो.

यष्टी, बेल्स आणि क्रिस[संपादन]

खेळपट्टीवरील प्रत्येक विकेटमध्ये एका सरळ रेषेत उभ्या केलेल्या तीन लाकडी यष्ट्यांचा समावेश असतो. त्यांच्या डोक्यावरती दोन लाकडी बेल्स ठेवल्या जातात; बेल्स धरुन विकेटची एकूण उंची २८.५ इंच (७२० मिमी) असते आणि तीन यष्ट्यांची, त्यांच्या मधील छोटी जागा धरुन एकूण रुंदी असते ९ इंच (२३० मिमी).

दोन्ही बाजूच्या विकेटच्या सभोवती चार रेघांनी आखलेल्या क्षेत्राला क्रीस असे म्हणतात, हे फलंदाजासाठी "सुरक्षित क्षेत्र" असते आणि ते गोलंदाजीची मर्यादा निश्चित करते. ह्यांना "पॉपिंग" (किंवा फलंदाजी) क्रीस, गोलंदाजी क्रीस आणि दोन "परतीचे (रिटर्न)" क्रिस असे म्हणतात.

यष्ट्या गोलंदाजी क्रीसच्या रेषेत अशा प्रकारे ठेवलेल्या असतात ज्यायोगे दोन टोकांच्या गोलंदाजी क्रीसमधील अंतर २२ यार्ड (२० मी) असेल. गोलंदाजी क्रीज ८ फूट ८ इंच (२.६४ मी) लांब असते, आणि मधली यष्टी अगदी मधोमध उभा केलेला असतो. पॉपिंग क्रीसची लांबीसुद्धा तितकीच असते, आणि ती गोलंदजी क्रीसला समांतर आणि यष्ट्यांच्या समोर ४ फूट (१.२ मी) अंतरावर आखलेली असते. परतीची किंवा रिटर्न क्रीस इतर दोन क्रीसच्या काटकोनात असते; त्या पॉपिंग क्रीजच्या दोन्ही शेवटाला चिकटून असतात आणि गोलंदाजी क्रीसच्या टोकांना जोडून कमीत ८ फूट (२.४ मी) मापाच्या असतात.

गोलंदाजीवेळी चेंडू सोडताना गोलंदाचा मागचा पाय दोन क्रीसच्या मध्ये आणि पुढच्या पायाचा किमान थोडासा भाग पॉपिंग क्रीसच्या आत असणे गरजेचे असते. गोलंदाजाने हा नियम मोडल्यास पंच तो चेंडू "नो बॉल" ठरवतात, आणि फलंदाजी संघाला एक अतिरिक्त धाव आणि एक अतिरिक्त चेंडू बहाल केला जातो.

फलंदाजाच्या दृष्टीने पॉपिंग क्रीसचे महत्त्व असे आहे की, त्यामुळे त्याच्या सुरक्षित क्षेत्राची मर्यादा स्पष्ट होते. तो त्याच्या "क्रीस बाहेर" असल्यास यष्टिचीत किंवा धावचीत होवू शकतो.

बॅट आणि चेंडू[संपादन]

मुख्य पाने: क्रिकेट बॅट व क्रिकेट चेंडू

खेळाचे मुख्य सार आहे, गोलंदाज खेळपट्टीवरील त्याच्या बाजूने दुसर्‍या बाजूला बॅट घेवून "स्ट्राईकवर" असलेल्या फलंदाजाकडे गोलंदाजी करतो.

बॅट ही (सहसा सफेद विलो वृक्षाच्या) लाकडापासून बनवली जाते आणि ज्याचा आकार वर गोलाकार दांडा जोडलेल्या पात्यासारखा असतो. पात्याची रुंदी कमाल ४.२५ इंच (१०८ मिमी) इतकी तर एकूण लांबी कमाल ३८ इंच (९७० मिमी) इतकी असते.

चेंडू हा शिवण असलेला जाड कातड्याचा आणि गोलाकार असतो, ज्याचा घेर ९ इंच (२३० मिमी) इतका असतो. ९० मैल प्रति तास (१४० किमी/ता) पर्यंत वेग असलेल्या चेंडूच्या टणकपणा हा चिंतेचा विषय असतो. त्यापासून बचाव करण्यासाठी फलंदाज विविध संरक्षक साधने वापरतात, जसे पॅड्स (नडगी आणि गुडघे यांच्या संरक्षणासाठी), फलंदाजी ग्लोव्हज् हातांसाठी, हेल्मेट डोक्याच्या संरक्षणासाठी आणि बॉक्स पँटच्या आतमध्ये (गुप्त भागाच्या संरक्षणासाठी). काही फलंदाज शर्ट आणि पँटच्या आतमध्ये जास्तीचे पॅड्स वापरतात जसे मांडीचे पॅड्स, हाताचे पॅड्स, बरगडी रक्षक आणि खांद्याचे पॅड्स. चेंडूला "शिवण" असते: चेंडूचे कातडी आवरण, दोरी आणि आतील कॉर्कला जोडण्यासाठी टाक्यांच्या सहा ओळी असतात. नवीन चेंडूवरील शिवण ही व्यवस्थित दिसते त्यामुळे जास्त अंदाज येवू न देता चेंडू पुढे टाकण्यास गोलंदाजाला मदत होते. क्रिकेट सामना सुरु असताता, चेंडूची गुणवत्ता इतकी खालावत जाते की एका क्षणी तो न वापरता येण्याजोगासुद्धा होतो आणि ह्या दरम्यान चेंडूची हालचाल बदलत जाते, आणि त्याचा प्रभाव सामन्यावर पडतो. त्यामुळे खेळाडू चेंडूचे भौतिक गुणधर्म बदलून त्याचे वर्तन सुधारण्याचा प्रयत्न करतात. चेंडूला लकाकी आणणे आणि घामाने किंवा थुंकीने तो ओला करणे वैध आहे. कधी कधी चेंडू स्विंग करण्यासाठी जाणूनबुजून एकाच बाजूला लकाकी सुद्धा आणता येते, परंतू चेंडूवर आणखी कोणती गोष्ट घासणे, चेंडूच्या आवरणावर ओरखाडणे किंवा चेंडूची शिवण उसवणे हे अवैध आहे.

पंच आणि स्कोअरकिपर[संपादन]

मुख्य पाने: पंच (क्रिकेट) व स्कोअरकीपर

मैदानावरील खेळाच्या नियमनाची कामगिरी दोन पंच पाहतात. त्यामधील एक गोलंदाजी टोकाकडे विकेटच्या मागे उभा राहतो, आणि दुसरा "स्क्वेअर लेग" स्थानावर उभा असतो, हे स्थान "स्ट्राईक"वर असलेल्या फलंदाजाच्या १५-२० मीटरवर असते. पंचांचे मुख्य काम असते ते विविध बाबींवर निर्णय देण्याचे. जसे चेंडू योग्य रितीने टाकला गेला आहे का (तो नो किंवा वाईड नाही), जेव्हा धाव काढली जाते, आणि फलंदाज बाद झाला आहे की नाही (ह्यासाठी क्षेत्ररक्षण करणार्‍या संघाने पंचांकडे सहसा हाऊज दॅट म्हणून अपील करणे गरजेचे असते). मध्यांतर केव्हा होईल हे सुद्धा पंच निश्चित करतात. तसेच खेळण्यासाठी परिस्थिती योग्य आहे किंवा नाही आणि खेळाडूंसाठी ओलसर खेळपट्टी किंवा अपुरा सुर्यप्रकाश ह्या सारख्या घातक परिस्थितीमध्ये खेळ थांबवणे किंवा रद्द करणे हे सुद्धा पंचांच्या हातात असते.

मैदानाबाहेर आणि ज्या सामन्यांचे दूरचित्रवाणीवर प्रक्षेपण होते, त्या सामन्यांमध्ये सहसा तिसरे पंच असतात. ज्या निर्णयांसाठी ध्वनीचित्रफितीच्या (व्हिडीओ) पुराव्याची गरज असते अशा वेळी ते निर्णय घेतात. संपूर्ण आयसीसी सदस्य असलेल्या दोन संघांमधील आंतरराष्ट्रीय कसोटी आणि मर्यादित षटकांच्या सामन्यात तिसरे पंच असणे अनिवार्य आहे. ह्या सामन्यांमध्ये सामनाधिकारीसुद्धा असतात. खेळ क्रिकेटच्या नियमांनुसार चालू आहे का हे पाहणे त्यांचे काम असते.

धावा आणि सामन्याच्या इतर तपशीलाची माहिती ठेवणे, हे दोन अधिकृत (प्रत्येक संघाचे प्रतिनिधीत्व करणारा एक) स्कोअरकीपरचे काम असते. पंचांनी हातांनी केलेल्या निर्देशांनुसार स्कोअरकीपर आपले काम करतात. जसे पंच तर्जनी वर करून फलंदाज बाद असल्याचे दर्शवतात; दोन्ही हात वर करुन ते फलंदाजाने षट्कार मारल्याचे दाखवतात. क्रिकेटच्या नियमांनुसार धावांच्या नोंदणीकरता स्कोअरकीपर असणे गरजेचे आहे; धावांच्या मोजणीशिवाय ते खेळा संबंधित लक्षणीय प्रमाणात अतिरिक्त तपशीलसुद्धा नोंदवतात.

डाव[संपादन]

डाव (एक किंवा अनेक) ही फलंदाजी संघाच्या सामूहिक कामगिरीसाठी वापरली जाणारी संज्ञा आहे.[१९] काहीवेळा फलंदाजी संघाचे सर्व अकरा सदस्य फलंदाजी करु शकतात, परंतू विविध कारणांमुळे ते सर्वच जण तसे करु शकत नाहीत. प्रत्येक संघ एक किंवा दोन डाव खेळेल हे सामन्याच्या प्रकारावरुन ठरते.

गोलंदाजाचे मुख्य लक्ष्य हे, क्षेत्ररक्षकांच्या मदतीने फलंदाजांना बाद करणे हे असते. फलंदाज जेव्हा बाद होतो, तेव्हा "आऊट" म्हणतात, म्हणजेच त्याला मैदाना सोडावे लागते आणि त्याची जागा त्याच्या संघातील दुसरा फलंदाज घेतो. जेव्हा सर्वच्या सर्व दहा फलंदाज बाद होतात, तेव्हा सर्व संघ बाद होतो आणि डाव संपतो. शेवटच्या बाद न झालेल्या फलंदाजाला, एकट्याने फलंदाजी चालू ठेवण्यास परवानगी नसते, त्यासाठी कमीत कमी दोन फलंदाज मैदानात असणे गरजेचे असते. ह्या फलंदाजाला "नाबाद" असे म्हणतात.

डाव लवकर संपण्याची तीन कारणे असू शकतात: फलंदाजी संघाच्या कर्णधाराने डाव "घोषित" केल्यास, फलंदाजी संघाने त्यांचे लक्ष्य गाठून सामना जिंकल्यास, किंवा खराब हवामानामुळे किंवा वेळ संपल्याने सामना संपल्यास. ह्या सर्व परिस्थितीमध्ये कमीत कमी दोन फलंदाज "नाबाद" राहून डाव संपतो. ह्याला अपवाद एकच, जेव्हा एखादा गडी बाद झाल्यानंतर दुसरा फलंदाज मैदानावर येण्याआधी डाव घोषित झाल्यास.

मर्यादित षटकांच्या सामन्यात, दोन फलंदाज "नाबाद" असतील, परंतू शेवटचे निर्धारित षटक टाकून झाले असल्यास डाव संपतो.

षटके[संपादन]

मुख्य पान: षटक (क्रिकेट)

गोलंदाज एकामागोमाग एक असा सहा वेळा चेंडू फेकतो, सहा चेंडूंच्या ह्या संचाला षटक असे म्हणतात. इंग्रजीमध्ये षटकाला Over असे म्हणतात कारण सहा चेंडू फेकून झाल्यानंतर पंच "Over!" असे म्हणतात. एक षटक पूर्ण झाल्यानंतर खेळपट्टीच्या दुसर्‍या बाजूने त्याच संघातील दुसरा गोलंदाज षटकाची सुरवात करतो, तसेच क्षेत्ररक्षणाच्या बाजू सुद्धा बदलल्या जातात, परंतू फलंदाज आपापल्या जागीच राहतात. एकच गोलंदाज लागोपाठ दोन षटके टाकू शकत नाही, परंतू तो गोलंदाज एकाच बाजूने एक वगळून एक अशी अनेक षटके टाकू शकतो. षटक पूर्ण झाल्यानंतर फलंदाज आपली जागा बदलत नाही त्यामुळे पुढच्या षटकामध्ये स्ट्रायकर फलंदाज आपोआप नॉन-स्ट्रायकरच्या भूमिकेत जातो आणि तसेच उलटपक्षी होते. (कधीकधी दोघांपैकी एक फलंदाज दूसर्‍यापेक्षा फलंदाजीत बलशाली असतो, तेव्हा तो शेवटच्या चेंडूवर एक धाव घेण्याचा प्रयत्न करतो, जेणेकरुन तो पुढच्या षटकामध्ये "स्ट्राईक"वर राहू शकेल.) षटक संपल्यानंतर पंच सुद्धा आपल्या जागा बदलतात त्यामुळे स्क्वेअर लेग जवळील पंच आता नॉनस्ट्राईकरच्या टोकाला विकेटच्या मागे उभा राहतो आणि त्याची जागा नॉनस्ट्राईकरवरचा दुसरा पंच घेतो.

कसोटी क्रिकेट मध्ये एक गोलंदाज कितीही षटके टाकू शकतो तर मर्यादित षटकांच्या सामन्यात, प्रत्येक गोलंदाज टाकू शकणार्‍या षटकांवरसुद्धा मर्यादा असते.

संघ रचना[संपादन]

प्रत्येक संघात अकरा खेळाडू असतात. खेळाडूच्या प्राथमिक कौशल्यावरुन त्या खेळाडूला तज्ञ फलंदाज किंवा गोलंदाज म्हटले जाते. एका संतूलित संघात सहसा पाच किंवा सहा तज्ञ फलंदाज आणि चार किंवा पाच तज्ञ गोलंदाज असतात. क्षेत्रक्षणाच्या विशिष्ट आणि महत्त्वाच्या जागेमुळे प्रत्येक संघात एक तज्ञ यष्टिरक्षक असतो. प्रत्येक संघाचे नेतृत्व एक कर्णधार करतो. फलंदाजीची क्रमवारी निश्चित करणे, क्षेत्ररक्षकांच्या जागा ठरवणे, गोलंदाज बदलणे, खेळाची रणनीती ठरवणे ही कर्णधाराची जबाबदारी असते.

जो खेळाडू फलंदाजी आणि गोलंदाजी ह्या दोन्हीत पारंगत असतो त्याला अष्टपैलू खेळाडू म्हणतात. जो क्रिकेटपटू फलंदाजी आणि यष्टिरक्षणामध्ये पारंगत असतो त्याला "यष्टिरक्षक फलंदाज", आणि काही वेळा अष्टपैलूसुद्धा म्हटले जाते. खरे अष्टपैलू अभावानेच आढळतात कारण बहुतेक खेळाडू हे एकतर फलंदाजी किंवा गोलदाजीवरच लक्ष केंद्रित करतात.

गोलंदाजी[संपादन]

परदेश दौरा करणारा पहिला इंग्लिंश संघ, उत्तर अमेरिकेला जाणार्‍या जहाजावर, १८५९
तीन यष्ट्या असलेली विकेट. ही मैदानामध्ये ठोकली जाते आणि त्याच्या वरती दोन बेल्स ठेवल्या जातात.
तीन भिन्न प्रकारचे क्रिकेट चेंडू:
  1. वापरलेला सफेद चेंडू. सफेद चेंडू मुख्यत्वे मर्यादित षटकांच्या क्रिकेटमध्ये वापरला जातो, विशेषतः सामने प्रकाशझोतात रात्री खेळवले जातात तेव्हा. (डावीकडे).
  2. वापरलेला लाल चेंडू. लाल चेंडू कसोटी क्रिकेट आणि प्रथम श्रेणी क्रिकेट आणि इतर काही क्रिकेट प्रकारांमध्ये वापरला जातो. (मध्य).
  3. वापरलेला गुलाबी चेंडू. गुलाबी चेंडू अलिकडच्या काळात प्रकाशझोतात खेळवल्या जाणार्‍या कसोटी सामन्यांसाठी वापरला जावू लागला आले. (उजवीकडे).
तीनही चेंडू सारख्याच आकाराचे आहेत.

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